रविवार, 15 अक्तूबर 2017

187. कंचनगढ़ की गुफा



 
गुफा में रह रहे- बाबा, जो पहाड़िया समुदाय से हैं.
       पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि इस गुफा में देखने लायक कुछ नहीं है। यह बस एक पहाड़ी गुफा है। यह प्राकृतिक है या मानव-निर्मित- पता नहीं। यह कितना प्राचीन है- इसकी भी जनकारी नहीं। वैसे, "रोमांच" के लिए हम यह कल्पना कर सकते हैं कि यह गुफा प्रागैतिहासिक काल की है- जब मनुष्य कन्दराओं में रहा करता था! (ध्यान रहे, हमारी "राजमहल की पहाड़ियाँ" जुरासिक काल की हैं- डेढ़-दो करोड़ साल पुरानी!)

गुफ-सामने से

एक शिवलिंग स्थापित है वहाँ
गुफा में कुछ अन्दर की तरफ

गुफा के बाहर का दृश्य
खास इसे देखने जाने के लिए कार्यक्रम नहीं बनाया जाना चाहिए। हाँ, अगर आप छुट्टी का दिन किसी प्राकृतिक स्थल में बिताना चाहते हैं, तो आपके लिए लगभग 20 किलोमीटर का पूरा यह रास्ता एक उपयुक्त स्थान है। सड़क से गुजरते वक्त आप कंचनगढ़ की इस गुफा की ओर भी जा सकते हैं। 
       पूरी बात इस प्रकार है-
       लिट्टीपाड़ा चौराहे से आमरापाड़ा की ओर बढ़ते समय थाना पार करके दाहिने नजर रखिये- एक सड़क दिखायी देगी। उस पर बढ़ जाईये। "लबदा घाटी" नाम से एक बस्ती आयेगी। बस्ती से निकलने के बाद असली घाटी आयेगी। खासा चढ़ाव है। यहीं से नयनाभिराम दृश्यों की शुरुआत हो जाती है। खूब तस्वीरें खींचिये, सेल्फी लीजिये और वीडियो बनाईये। 


घाटी वाली सड़क से गुजरते समय बाँयी तरफ नजर रखिये- बोर्ड लगा होगा- "कंचनगढ़ गुफा"। उल्टा "U" आकार की सड़क गुफा के लिए जाती है, यानि एक सड़क से अन्दर जाकर आप दूसरी सड़क से लौट सकते हैं- मुख्य सड़क पर। बिल्कुल पहाड़ से सटकर सड़क खत्म होती है। गाड़ी वहीं छोड़िये और पहाड़ की पगडण्डी पर पैदल चलना शुरु कर दीजिये। करीब सौ मीटर की चढ़ाई के बाद आप गुफा के सामने होंगे। 


गुफा देखने के बाद फिर आगे बढ़ना शुरु कर दीजिये। दाहिनी ओर बोल्डर की "गार्ड वाल" है और इस वाल की दूसरी तरफ एक बार फिर नयनाभिराम दृश्यों का सिलसिला शुरु हो जायेगा। एकबारगी यकीन नहीं होगा कि हम सन्थाल-परगना में राजमहल की पहाड़ियों की वादियों में हैं! लगेगा- किसी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पर आ गये हैं! यहाँ भी खूब फोटोग्राफी कीजिये। 

14 किलोमीटर पर "तिराहा" आयेगा- दाहिने "सिमलौंग" है, बाँये- "कुंजबोना"- एक गाँव। कोयले का खदान देखने का शौक हो, तो सिमलौंग जाया जा सकता है (बेशक, हम नहीं गये थे)। हम बाँये गये थे- कुंजबोना की ओर। प्राकृतिक दृश्यों का उपभोग करते हुए आप भी आगे बढ़ते रहिये- सड़क क्या है- बस "साँप" है... "लहरिया" काटते हुए बढ़ते रहिये। । 
आप पहुँच जायेंगे- "पकलो"। लिट्टीपाड़ा से पकलो तक की यह सड़क हाल ही में बन कर तैयार हुई है- दो साल पहले 10-12 किलोमीटर सड़क निर्माणाधीन थी और हमलोग मुश्किल से इसे पार कर पाये थे। अभी तो फर्राटा भरते हुए सफर किया जा सकता है- इससे पहले कि सड़क खराब होनी शुरु हो- इस पर सफर का लुत्फ उठा लीजिये- हो सके, 2018 का नया साल यहीं मनाईये... 

खैर, पकलो से दाहिने मुड़ियेगा, तो ढाई किलोमीटर बाद आप "वायु सेना स्थल, सिंगारसी" के मुख्य द्वार पर खुद को खड़ा पायेंगे- चाहे तो जा सकते हैं उस तरफ- उधर ज्यादातर चढ़ाव है। नहीं तो पकलो से बाँये मुड़ जाईये- इधर ढलान ही ढलान है- करीब पन्द्रह किलोमीटर बाद आप मुख्य सड़क पर होंगे- दाहिनी तरफ आमरापाड़ा, बाँयी तरफ लिट्टीपाड़ा- जिधर जाना हो, बढ़ जाईये...
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नोट- हो सका, तो बाद में कुछ वीडियो के लिंक यहाँ प्रस्तुत करुँगा.


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पुनश्च:
1.   जो बात मेरी समझ में नहीं आ रही है, वह यह है कि जिस इलाके में यह गुफा है, उसका नाम "कंचनगढ़" क्यों है? आदिवासी इलाकों में ऐसे नाम तो नहीं होते! क्या इस स्थान का कोई इतिहास है?
2.   प्रसंगवश, बता दूँ कि हमारे इस इलाके का पुराना नाम "कजंगल" है। पूरब में गंगा-गुमानी नदियों का संगम; पश्चिम में तेलियागढ़ी का किला; उत्तर में गंगा नदी और दक्षिण में राजमहल पहाड़ियों की तलहटी- इस चौहद्दी के बीच का क्षेत्र "कजंगल" कहलाता था। कायदे से इस पर शोध नहीं हुआ है।
3.   गुफा में जो बाबा बैठे हुए थे उनसे हमने यह पूछा था कि इस गुफा के बारे में आप क्या जानते हैं? उनका कहना था धरती माँ की शुरुआत के समय से यह गुफा है। मैं यह पूछ सकता था कि क्या आप इसे "पिल्चू बूढ़ी" और "पिल्चू हाड़ाम" का घर मानते हैं, पर पता नहीं क्यों, नहीं पूछा। पूछना चाहिए था। (मनु-श्रद्धा या आदम-हौव्वा के आदिवासी संस्करण हैं- पिल्चू बूढ़ी, पिल्चू हाड़ाम।)  
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बुधवार, 20 सितंबर 2017

186. "पितर"




      


       मेरे ख्याल से, हर व्यक्ति को अपने कैशोर्य एवं नवयौवन में "नास्तिक" एवं "बागी" होना ही चाहिए! जो ऐसे होते हैं, वही आगे चलकर "धर्म" के "मर्म" को, "परम्पराओं" के "निहितार्थ" को समझ सकते हैं। बचपन से ही धर्मपरायण होना कोई शुभ लक्षण नहीं है- खासकर, "कर्मकाण्डी" तो बिलकुल नहीं होना चाहिए!
       हम भी एक "नास्तिक" के रुप में पिताजी के धर्मिक क्रियाकलापों का विरोध किया करते थे। तब हम "पितृपक्ष" के बारे में न कुछ जानते थे, न ही जानना चाहते थे। पिछले साल पिताजी गुजर गये। इस साल हमने पहली बार जानने की कोशिश की कि "पितृपक्ष" क्या है। बेशक, "कर्मकाण्डी" हम आज भी नहीं हैं, मगर इस पक्ष के प्रति मेरे मन में श्रद्धा जरुर जाग गयी है। आज ही की बात है, पण्डितजी भोजन कर रहे थे, उन्होंने बताया कि जिसका एक ही पुत्र होता है, उसे सोमवार को दाढ़ी नहीं बनानी चाहिए। हमने तुरन्त प्रतिवाद किया और कहा कि आज से ढाई हजार साल पहले ही गौतम बुद्ध यह कह गये हैं कि किसी गुरूजन की बात को आँख बन्द करके सिर्फ इसलिए मत मान लो कि इसे गुरूजन ने कहा है। उस बात को तर्क की कसौटी पर कसो और जब अन्तरात्मा सहमत हो, तभी मानो। ...तो इस दाढ़ी न बनाने वाली बात के पीछे हमें कोई तर्क नजर नहीं आ रहा। मेरे हिसाब से, "श्रद्धा" को भी "तर्कपूर्ण" होना चाहिए! नहीं तो हमें "अन्धश्रद्धालु" बनते देर नहीं लगेगी!
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       खैर, अब एक दूसरी बात। मेरे दादाजी ने 1931 में हमारे कस्बे के मेन रोड पर मुख्य बाजार से कुछ बाहर एक प्लॉट खरीदा था दस हजार वर्गफीट का। यह पिताजी के जन्म से पहले की बात है। बाद के दिनों में चाचाजी ने आधा हिस्सा बेच दिया और आज पाँच हजार वर्गफीट का प्लॉट हमारे पास है। हम चाहते थे कि पिताजी की आँखों के सामने वहाँ एक शानदार भवन बन जाय, मगर वे सिर्फ मेरे द्वारा बनाये गये "प्लान" को ही देख पाये, जिसे हमने कम्प्यूटर पर (एक पुराने प्रोग्राम '3-डी होम आर्टिटेक्ट' पर) बनाया था। प्लान देखकर पिताजी ने मुस्कुरा कर अपना "भरोसा" जता दिया था कि जो भी बनेगा, अच्छा ही बनेगा। हमने यह भी बताया कि इस भवन को "JMC" नाम देने की इच्छा है- दादाजी के नाम पर- 'जोगेन्द्र मेमोरियल कॉम्प्लेक्स'।
       इस साल उस प्लॉट पर- सामने के हिस्से में- लगभग 1200 वर्गफीट क्षेत्रफल वाले भवन निर्माण का काम शुरु हुआ। दादाजी के बनवाये दो कमरों के पुराने मकान को तोड़ा गया। अफसोस कि तुड़वाने से पहले उस मकान की तस्वीर लेने की सुध हमें नहीं रही। निर्माण शुरु होने के बाद बीच-बीच में तस्वीरें ले रहे हैं। हमलोग आर्थिक रुप से बहुत सक्षम तो नहीं है, फिर भी अपने "पितरों के आशीर्वाद के भरोसे" काम चलाये जा रहे हैं और यह उम्मीद करते हैं कि यहाँ एक शानदार भवन बनेगा।
       यह भवन ही देखा जाय, तो हमारा पितरों के प्रति "तर्पण" होगा...
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पुनश्च:
जब हम पिताजी के धार्मिक या आध्यात्मिक क्रिया-कलापों पर सवाल उठाते थे, तब वे (आम तौर पर) स्पष्टीकरण नहीं देते थे। उन्हें लगता होगा- समय आने पर हम खुद अपने सवालों के उत्तर खोज लेंगे। उन्हें ऐसा इसलिए लगता होगा कि वे खुद अपनी युवावस्था में नास्तिक हुआ करते थे। एक उम्र के बाद वे आध्यात्मिक हुए। जहाँ तक दादाजी की बात है, मेरा अनुमान है कि जीवन के उत्तरार्द्ध या अन्तिम दिनों में भी वे धार्मिक या आध्यात्मिक प्रवृत्ति के नहीं हुए होंगे।
       आज हम पुत्र अभिमन्यु की नास्तिकता को देखकर मन ही मन प्रसन्न होते हैं। एक उम्र के बाद वह बिलकुल "अपने ढंग से" धर्म एवं पराम्पराओं को समझेगा।
       ऐसे ही हर व्यक्ति को अपना "सत्य" खुद खोजना चाहिए... लकीर का फकीर बनने में जीवन की कोई सार्थकता नहीं है!
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