शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

196. "ओक्का-बोक्का"


       आज फेसबुक पर वरिष्ठ मित्र नारायण प्रसाद शर्मा जी ने उन गीतों की याद दिलायी, जिन्हें हम अपने बचपन में विभिन्न खेल खेलते समय दुहराया करते थे। उनकी पोस्ट निम्न प्रकार से है:
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बच्चों का अपने खेलों में टॉस करने का मनोरंजक एवं रचनात्मक तरीका उसकी कुछ बानगी प्रस्तुत है-
१.       अब्बक दब्बक दायं दीं, गोल चौवल पायं पीं, रंग रूप सरूप राय रज्जा (१३ शब्दों की आवृत्ति)
२.       अटकन, बटकन, दही, चटाकन, लौहा, लाटा, बन के, काटा, तुहुर, तुहुर, पानी आवै , सावन में करेला पाके, चल, चल, बिटिया, गंगा, जाई, गंगा, ले, गोदावरी, पाका, पाका, बेल खाई, बेल, के डारा, टूट गए, भरे, कटोरा, फूट गए, (१७ शब्दों की आवृत्ति)
३.       इस, पीस, कोयला, पीस, मारे, दबक्का, उन्नीस, बीस (८ शब्दों की आवृत्ति)

देश के विभिन्न क्षेत्रों में पद्यों के सैकड़ों प्रकार मिल जावेंगे जो कि भुलाए नहीं भूले जाते मित्र अपने बचपन में कुछ समय के लिए प्रवेश करें तो उन्हें वह सब कुछ याद आ जावेगा जिसके लिए आज वे तरस रहे हैं
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जैसा कि उन्होंने कहा है- हमने भी अपने बचपन में प्रवेश कर गीतों को याद करने की कोशिश की, मगर अफसोस, कि कोई गीत पूरा याद नहीं आया। जितना याद आया, उतना लिख रहा हूँ और यह उम्मीद कर रहा हूँ कि कोई-न-कोई मित्र इन गीतों को जरूर पूरा करेगा:-
१.       "ओक्का-बोक्का, तीन-तिरोक्का, लोहा-लाठी, चन्दन-काठी, बाग में बघवन डोले, सावन में करैला फूटे, ................" (बाकी याद नहीं आ रहा)
इस गीत को आम तौर पर 'ओक्का-बोक्का' खेलते समय गाया जाता था। इस खेल में सभी बच्चे गोल घेरा बनाकर बैठते थे और सभी अपने हाथों को सामने उँगलियों पर टिकाकर रखते थे। एक बच्चा 'ओक्का-बोक्का' गाते हुए अपनी उँगली से सभी हाथों को छूता था। जहाँ गीत खत्म होता था, वहाँ उस हथेली को पिचका दिया जाता था। इसके बाद और भी कई चरण थे, जो अब ठीक से याद नहीं रहे।
२.       एक खेल ऐसा था, जिसमें एक बच्चा अपना एक पैर आगे कर उसके अँगूठे को पकड़ लेता था। फिर उसके (हाथ के) अँगूठे को दूसरा बच्चा पकड़ता था और फिर इस तरह सभी बच्चे मिलकर एक पेड़ बना लेते थे। फिर एक बच्चा एक हथेली को कटार बनाकर पेड़ को काटता था। तब जो गीत गाया जाता था, वह कुछ इस प्रकार से था:
"ताड़ काटे, तरकुल काटे, काटे रे बनखाजा........" (बेशक, आगे कुछ याद नहीं)
३.       एक गीत जो हम बच्चों को बहुत प्रिय होता था, वह था- "घुघुआ-घूघ"। इसे बड़े गाते थे, या हम बच्चों में से ही जो बड़े होते थे, वे गाते थे। इसमें छोटे बच्चों को झुला झुलाया जाता था, इसलिए शायद यह छोटे बच्चों को बहुत प्रिय हुआ करता था। बड़े बिस्तर पर पीठ के बल लेट जाते थे- अपने दोनों घुटनों को झूला बनाते हुए। बच्चे पैर पर बैठ जाते थे। बड़े गाते हुए बच्चे को झुलाते थे और आखिरी पंक्ति में बच्चों को बहुत ऊँचा उठा देते थे। गीत था:
"घुघुआ घुघ, मरेल पुर, चल गे बिल्ली, ककड़ी खेत, मैया गे मैया, डर लागे छौं, कथी के डर बेटा, कथी के डर, ऊपर कछुआ डोलैछे, नीचे सितुआ लोटैछे, ............" (बाकी याद नहीं आ रहा, मगर एक शब्द 'फुदकल जाम' (फुदकते जाऊँ) इसमें आता था)
यह गीत बिहार की जिस बोली में है, उसे "छै-छा" कहते हैं। इसके कई स्वरुप हमारे इलाके में पाये जाते हैं।
४.       ऊपर जिस "घुघुआ-घूघ" गीत का जिक्र हुआ है, उसका एक बँगला संस्करण भी है। चूँकि मेरे घर में बँगला बोली जाती थी (है) और ननिहाल में "छै-छा", इसलिए दोनों गीतों के कुछ शब्द याद रह गये हैं। बँगला गीत इस प्रकार से है:
"घुघु-घुघु, तिसि-ताल, बेटा-छेला, माछ मारते........ (दिमाग में बहुत जोर डालकर भी आगे याद नहीं आ रहा!)
५.       इनके अलावे और भी आधा दर्जन तरह के खेल थे, जैसे दो टीम बनाकर किसी एक की आँखें बन्द कर अपनी टीम से किसी को "छ्द्म नाम" से बुलाना- जैसे, "आ रे मेरे आम"; एक खेल था जिसमें एक गोल घेरे के बाहर कोई दौड़ते हुए बोलता था- "राजा, राजा किवाड़ी खोल" घेरे के बच्चे पूछते थे- "कौन है?" उत्तर आता था- "खपड़ियो चोर"। दरअसल, इस खेल को मारवाड़ी बच्चों ने लोकप्रिय बनाया था- शायद यह खेल राजस्थान में खेला जाता है। "डेंगा-पानी", "सतमी-ताली", "बुढ़िया-कबड्डी", "रूमाल-चोर"-जैसे खेल तो शायद देश भर में खेले जाते होंगे। हमारे इलाके का एक दम-खम वाला खेल था‌- "गद्दी"। अपनी किशोरावस्था में हमने इसे खूब खेला है।
फिलहाल इतना ही, बाकी फिर कभी फुर्सत में कुछ और जोड़ा जा सकता है इस आलेखा में...  
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लगे हाथ, इन खेलों के बारे में बताते हुए मैंने बच्चों की दो तस्वीरें भी खींच ली- 


रविवार, 28 जनवरी 2018

१९५. "हाब-गुबा-गुब"


       बंगाल- बेशक, बाँग्लादेश सहित- की एक गायन शैली है- "बाउल"। यह लोकगीत की एक शैली है। इसे गाने वाले आम तौर पर यायावर सन्यासी होते हैं, जो विचारधारा से वैष्णव होते हैं। जानकारी मिलती है कि सूफी फकीर भी इसे गाते हैं- हो सकता है, बाँग्लादेश में ये पाये जाते हों। अपने बँगाल में गेरूआ चोगा पहने, गले में तुलसी माला लटकाये और सिर पर गेरूआ पगड़ी बाँधे ये लोकगायक अक्सर कहीं-न-कहीं मिल जाते हैं। बेशक, महिला सन्यासिनी भी होती हैं बाउल गाने वालीं। जीवन की आपाधापी में फँसे लोगों को ये लोग अपने अद्भुत गायन से संसार की नश्वरता का सन्देश देते हैं।
इस कलाकृति में एक वैष्णव सन्यासी बाउल गा रहा है...

...तो इस कलाकृति में एक सूफी फकीर को बाउल गाते हुए दिखाया गया है. 
       इनके हाथ में इकतारा किस्म का एक वाद्ययंत्र होता है, जिसकी ध्वनि इनके गायन के साथ ऐसे घुल-मिल जाती है कि बिना इस वाद्ययंत्र के संगीत के बाउल गान की कल्पना ही नहीं की जा सकती! यह वाद्ययंत्र कद्दू के बाहरी आवरण से बना होता है, ऊपर बाँस की दो खपच्चियाँ जुड़ी होती हैं, पेन्दे की तरफ चमड़ा लगा होता है और खपच्चियों के सिरे से लेकर चमड़े तक एक तार लगा होता है। (अब आधुनिक किस्म के वाद्ययंत्र भी बनने लगे हैं, जैसा कि पिछले दिनों मैंने ट्रेन में देखा- युवा बाउल गायक के हाथ में।)

       इस वाद्ययंत्र को हमलोग अपने बचपन में "हाब-गुबा-गुब" कहते थे। अनुमान लगाता हूँ कि गाँव-देहातों में आज भी इसे "हाब-गुबा-गुब" ही कहा जाता होगा। यह नाम इसे इससे निकलने वाली ध्वनि के आधार पर दिया गया है।

       अभी नेट पर जानकारी बढ़ाने के क्रम में पता चला कि एक तार वाले वाद्ययंत्र को वास्तव में 'गुबगुबा' ही कहते हैं। जिस वाद्ययंत्र में दो तार लगे होते हैं, उन्हें 'खोमोक' कहते हैं।
       जानकारी मिल रही है कि इकतारा-दोतारा के अलावे दो से अधिक तारों वाले सारंगी-जैसे वाद्ययंत्र और छोटे तबले-जैसे "डुगी" का भी इस्तेमाल होता है बाउल में। घुँघरू और करताल का इस्तेमाल तो खैर होता ही है।
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       जब हमलोग सवारी रेलगाड़ी में अपने यहाँ से रामपुरहाट या इससे आगे जाना-आना करते हैं, तो अक्सर ट्रेन में बाउल गाने वाले मिल ही जाते हैं। कभी कोई युवा सन्यासी अकेला गाता है और कभी कोई वैष्णव दम्पत्ति साथ में गाते हैं।
       कुछ समय पहले ट्रेन में एक युवा सन्यासी को बाउल गाते देखा, तो मैंने उसका विडियो बना लिया था। उसे यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है।  
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       इस आलेख को लिखने से पहले जब मैंने थोड़ी-सी जानकारी बढ़ानी चाही बाउल के बारे में, तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 'युनेस्को' ने साल २००५ में इस गायन शैली को मानवता के धरोहर ("Masterpieces of the Oral and Intangible Heritage of Humanity") की सूची में शामिल किया है।
       एक और जनकारी मिली कि "लालन फकीर" (१७७४-१८९०) अब तक के सबसे प्रसिद्ध बाउल गायक हुए हैं। बाउल संगीत की उत्पत्ति के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है। सदियों से यह संगीत परम्परा बंगाल की संस्कृति में रच-बस कर बंगाली जन-मानस को प्रभावित करती रही है। कहते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर भी इस संगीत से प्रभावित थे और रवींद्र संगीत में कुछ हद तक उसकी छाप मिल जाती है। मेरा अनुमान है कि एस.डी. बर्मन साहब ने भी कुछ फिल्मी गीतों में बाउल संगीत वाली शैली का उपयोग किया है।

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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

१९४. स्टीमर यात्रा का एक अनुभव

      साहेबगंज और मनिहारी के बीच जो स्टीमर सेवा (इसे एल.सी.टी., लाँच, या जहाज कहते हैं) चलती है, उससे हमने कई बार यात्रायें की हैं। कई अनुभवों का जिक्र इस ब्लॉग पर है। आज एक और अनुभव का जिक्र कर रहे हैं- आज के अखबार में प्रकाशित एक खबर को पढ़कर उस अनुभव की याद आ गयी है।
वाकया ऐसा है कि बीच गंगा में चलते-चलते स्टीमर अचानक एक छोटे-से दियारा की ओर मुड़ने लगा। हम सभी यात्री चकित रह गये कि स्टीमर अचानक इस निर्जन टापू की ओर क्यों मुड़ रहा है!
       खैर, स्टीमर ने उस निर्जन टापू के किनारे लंगर डाला और इसके बाद जहाज के स्टाफ लोगों की बातचीत से पता चला कि इंजन का डीजल खत्म हो गया है! दरअसल, हुआ यूँ था कि सुबह स्टीमर पर चढ़ाने के लिए डीजल के कुछ ड्रम घाट पर रखे हुए थे, जिन्हें स्टाफ लोग चढ़ाना भूल गये थे। डीजल के ड्रम घाट पर ही रखे रह गये थे।
       खैर, यह मोबाइल का जमाना है, तुरत-फुरत में फोन किया गया और फिर एक छोटे स्टीमर पर डीजल के उन ड्रमों को चढ़ाकर लाया गया। पूरा वाकया घण्टे-दो घण्टे से ज्यादा का नहीं था। दिन का समय था, यात्रियों को कोई खास परेशानी भी नहीं हुई।

       ...मगर आज अखबार में हमने पढ़ा कि साहेबगंज से शाम को जो स्टीमर खुला, वह कोहरे में रास्ता भटक गया और फिर रात भर के लिए वह एक ही स्थान पर लंगर डाले खड़ा रहा! एक तो कोहरे में लिपटी सर्द रात और ऊपर से गंगा की सांय-सांय चलती ठण्डी हवायें। सोचकर भी सिहरन होती है कि करीब डेढ़ सौ लोगों ने रात कैसे काटी होगी- बेशक, यात्रियों में बच्चे भी थे।  
       मनिहारी से नावों को रवाना किया गया, जो किसी तरह जहाज तक पहुँचे। फिर सुबह उन नावों से ही यात्रियों को सकुशल मनिहारी पहुँचाया गया।

       गंगा में शाम से ही कोहरा छाने लगता है- ऐसा बीते दो हफ्ते से हो रहा है, ऐसे में साहेबगंज से शाम साढ़े चार बजे स्टीमर को रवाना करने के फैसले को किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता। खैर, उम्मीद है कि यात्रियों को और स्टीमर के परिचालकों को- दोनों को सबक मिल गया होगा।   

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

१९३. “सोंस”


        कल के अखबार में एक दुःखद समाचार प्रकाशित हुआ था- हमारे इलाके में कुछ ग्रामीण एक “सोंस” को मारकर खा गये
       “सोंस” एक मछली का नाम है, जो गंगा में पायी जाती है। जब नदियाँ मुक्त होकर बहती थीं, यानि जब बाँध आदि नहीं बने थे और जब नदियाँ प्रदूषित नहीं हुआ करती थीं, तब इनकी संख्या बहुत रही होंगी, मगर अब इनकी संख्या दो हजार से कम है। २००९ से इसके शिकार पर प्रतिबंध है। गंगा के एक हिस्से को (सुल्तांगंज से कहलगाँव तक का क्षेत्र) इनके लिए आश्रयस्थली भी घोषित कर दिया गया है।
       “सोंस” एक प्रकार की डॉल्फिन है। विकिपीडिया में इसपर जो जानकारी दी गयी है, उसे मैं यहाँ साभार उद्धृत कर रहा हूँ, ताकि इसके बारे में जानकारी और भी लोगों तक पहुँचे:
       गंगा नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica gangetica) and सिंधु नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica minor) मीठे पानी की डॉल्फिन की दो प्रजातियां हैं। ये भारतबांग्लादेशनेपाल तथा पाकिस्तान में पाई जाती हैं। गंगा नदी डॉल्फिन सभी देशों के नदियों के जल, मुख्यतः गंगा नदी में तथा सिंधु नदी डॉल्फिन, पाकिस्तान के सिंधु नदी के जल में पाई जाती है। केंद्र सरकार ने ०५ अक्टूबर २००९ को गंगा डोल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है। गंगा नदी में पाई जाने वाली गंगा डोल्फिन एक नेत्रहीन जलीय जीव है जिसकी घ्राण शक्ति अत्यंत तीव्र होती है। विलुप्त प्राय इस जीव की वर्तमान में भारत में २००० से भी कम संख्या रह गयी है जिसका मुख्य कारण गंगा का बढता प्रदूषण, बांधों का निर्माण एवं शिकार है। इनका शिकार मुख्यतः तेल के लिए किया जाता है जिसे अन्य मछलियों को पकडनें के लिए चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। एस समय उत्तर प्रदेश के नरोरा और बिहार के पटना साहिब के बहुत थोड़े से क्षेत्र में गंगा डोल्फिन बचीं हैं। बिहार व उत्तर प्रदेश में इसे 'सोंस' जबकि आसामी भाषा में 'शिहू' के नाम से जाना जाता है। यह इकोलोकेशन (प्रतिध्वनि निर्धारण) और सूंघने की अपार क्षमताओं से अपना शिकार और भोजन तलाशती है। यह मांसाहारी जलीय जीव है। यह प्राचीन जीव करीब १० करोड़ साल से भारत में मौजूद है। यह मछली नहीं दरअसल एक स्तनधारी जीव है। मादा के औसत लम्बाई नर डोल्फिन से अधिक होती है। इसकी औसत आयु २८ वर्ष रिकार्ड की गयी है। 'सन ऑफ़ रिवर' कहने वाले डोल्फिन के संरक्षण के लिए सम्राट अशोक ने कई सदी पूर्व कदम उठाये थे। केंद्र सरकार ने १९७२ के भारतीय वन्य जीव संरक्षण कानून के दायरे में भी गंगा डोल्फिन को शामिल लौया था, लेकिन अंततः राष्ट्रीय जलीव जीव घोषित करने से वन्य जी संरक्षण कानून के दायरे में स्वतः आ गया। १९९६ में ही इंटर्नेशनल यूनियन ऑफ़ कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर भी इन डॉल्फिनों को तो विलुप्त प्राय जीव घोषित कर चुका था। गंगा में डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि 'मिशन क्लीन गंगा' के प्रमुख आधार स्तम्भ होगा, क्योंकि केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश के अनुसार जिस तरह बाघ जंगल की सेहत का प्रतीक है उसी प्रकार डॉल्फिन गंगा नदी के स्वास्थ्य की निशानी है।
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मछुआरों को चाहिए कि जब भी कोई “सोंस” उनके जाल में फँसे, तो वे उसे वापस पानी में छोड़ दें। यह एक “विलुप्तप्राय” जलीय जीव है, यह हमारे देश का “राष्ट्रीय” जलीय जीव है। इसे न मारा जाय। नहीं तो यह प्राणी विलुप्त हो जायेगा।
       मॉरिशस में एक पक्षी पाया जाता था, जिसे “डोडो” कहा जाता था- उसके सरल स्वभाव के कारण। उसके खात्मे का दाग “डच” लोगों पर लगा हुआ है। डच लोगों ने इतना मारकर खाया उसे कि वह पक्षी धरती से विलुप्त ही हो गया।
       ऐसा कोई दाग हम गंगा किनारे रहने वालों पर- खासकर भागलपुर से साहेबगंज के बीच के इलाकों के- न लगे। 
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नीचे की तस्वीर बाँग्लादेश की है- 


...और यह दर्दनाक तस्वीर आसाम से है-